मातृप्रेम, त्याग एवं साधना की मूर्त अभिव्यक्ति -: श्रीरामकृष्ण परमहंस

फ़रवरी 19, 2026 - 20:09
फ़रवरी 19, 2026 - 20:13
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मातृप्रेम, त्याग एवं साधना की मूर्त अभिव्यक्ति -: श्रीरामकृष्ण परमहंस
मातृप्रेम, त्याग एवं साधना की मूर्त अभिव्यक्ति -: श्रीरामकृष्ण परमहंस
मातृप्रेम, त्याग एवं साधना की मूर्त अभिव्यक्ति -: श्रीरामकृष्ण परमहंस

" मां, क्या अब भी तुम्हारा दर्शन नहीं होगा? मां, मां दर्शन दो..."  

भवतारिणी के मंदिर में खड़े उपासक भावोन्मत हृदय के साथ मां को पुकारते रहे। प्रतिमा सम्मुख ही थी, किंतु वे चिन्मयी दर्शन के आकांक्षी थे। नानालंकारों से विभूषित देवी के वाम हस्त में खड्ग सुशोभित था। संत की दृष्टि पड़ी।

"दर्शन लाभ भी न हो सका, जीवन वृथा ही है।"

भगवतोन्माद में यह निश्चय कर प्राण देने हेतु उन्होंने खड्ग उठाया ही था कि कक्ष अपूर्व ज्योति से उद्भासित हो उठा। उनके अपने ही शब्दों में  "गंगा जी की लहर हो या मंदिर प्रांगण,  चंहुओर प्रकाश ही प्रकाश दिखता था, कुछ ही क्षणों में मुझे मूर्छा आ गई।" जब कुछ स्थिर हुए तो मुख पर केवल मां का ही नाम था। 

ज्योतिर्मयी पराम्बा ने अपने साधक की अभिलाषा पूर्ण की। यह असीम मातृस्नेह के अधिकारी, त्याग एवं शुद्धा भक्ति के मूर्तिमंत स्वरूप संतश्रेष्ठ श्रीरामकृष्ण देव थे। आज से १९० वर्ष पूर्व बंगप्रदेश के कामारपुकुर में जन्मे एक बालक ने विश्व को भागवतिक प्रेम की ओर उन्मुख किया। उनके तप, ज्ञान एवं भाव से ही कलकत्ता का श्री दक्षिणेश्वर क्षेत्र वर्तमान युग के तीर्थ में परिणत हुआ है। 


उपासना के उच्चतम शिखर पर आरूढ़ श्रीरामकृष्ण 

श्रीरामकृष्ण देव मातृभक्त थे, तथापि उन्होंने अन्यान्य उपासना पद्धतियों का भी अवलंबन किया। सुविज्ञा भैरवी ब्राह्मणी के निर्देशन में तंत्र साधना की। वात्सल्य एवं मधुर भाव की साधना हेतु जटाधारी उनके गुरु हुए। वहीं, तोतापुरी के सानिध्य में अद्वैतोपासना में प्रवृत्त होकर शीघ्र ही निर्विकल्प समाधि की प्राप्ति की। संतश्रेष्ठ ने ईसाई और इस्लाम धर्म की साधना भी की थी। अनेकानेक साधन पद्धतियों के अवलंबन के बाद, जिस सत्य का साक्षात्कार उन्होंने किया था, उसे विश्व के समक्ष प्रगट कर दिया। अत्यंत सधे शब्दों में उन्होंने कहा " यह जीवन पाकर ईश्वर लाभ करना ही मनुष्य जन्म का लक्ष्य है। सारे मार्ग उसी परमात्मा की ओर पहुंचाते हैं।" 

गुरुवर्य रामकृष्ण

श्रीरामकृष्ण देव भुवनमोहिनी मां के आश्रित थे। मां ने संकेत कर दिया था कि भविष्य में उन्हें विभिन्न शिष्यों का जीवन गढ़ना होगा। इसके बाद ठाकुर सत्य दर्शन के अभिलाषी युवकों की प्रतीक्षा करते रहते। जिस दिन कोई न आता, उन्हें अपार पीड़ा होती। कुछ ही दिनों में युवक भक्त जुटने लगे। श्रीरामकृष्ण देव व्यक्ति को देखते ही सटीक पहचान कर लेते। 

सात्विक लक्षण वाले ऐसे शिष्यों को ईश्वरविषयक चर्चाओं और गूढ़ साधन के विषय में उपदेश देकर उन्हें प्रेरित किया। जप, कीर्तन या निर्जन में साधन भजन , श्रीरामकृष्ण शिष्यों को उनकी प्रवृत्ति के अनुसार साधना-पथ पर अग्रसर करते। उनके त्यागी शिष्यों की कुल संख्या १६ थी, जिन्हें श्रीरामकृष्ण देव का मुख्य पार्षद कहा जाता है।

उनके शिष्य और भावधारा में महापुरुष महाराज के नाम से विख्यात स्वामी शिवानंद ने लिखा है कि " प्रेम की अमोघ शक्ति से ही उन्होंने हम सबको बांधे रखा था। एक माता अपनी संतान को जैसा प्रेम करती है,  ठाकुर ठीक उसी प्रकार हमें चाहते थे, किंचित अधिक ही.." 


त्यागी एवं गृही भक्तों के आदर्श 

श्रीरामकृष्ण देव त्यागियों के लिए कठोर तप, इंद्रिय-निग्रह और अखंड ईश्वरानुसंधान का उच्चतम आदर्श हैं, तो गृहस्थों के लिए कर्तव्य और साधना के मधुर समन्वय का मार्गदर्शक। श्रीरामकृष्ण स्वयं विवाहित थे, किंतु उनका दांपत्य जीवन पूर्णतः ब्रह्मचर्य, आत्मसंयम और ईश्वरकेंद्रित भाव से आलोकित था। उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि संन्यास केवल बाह्य परित्याग का नहीं, आंतरिक आसक्ति-त्याग का नाम है। श्री मां सारदा श्रीरामकृष्ण देव की लीलासहधर्मिणी थीं। उन्होंने कभी श्रीरामकृष्ण के साधन मार्ग एवं भागवतिक भाव को अवरुद्ध करने का प्रयास नहीं किया, वरन् सहायक ही हुई। 

श्री रामकृष्ण देव नारी जाति में मातृशक्ति का ही दर्शन करते थे। अपनी पत्नी में भी उन्होंने जगदंबा का ही दर्शन पाया। उल्लेखनीय है कि श्रीठाकुर ने अपनी समस्त साधना का फल श्री मां सारदा को समर्पित किया था। परवर्ती काल में मां ही रामकृष्ण मठ - मिशन में संघ जननी के रूप में प्रतिष्ठित हुईं। 


गुरु निष्ठा का अपूर्व उदाहरण

श्रीरामकृष्णदेव के सुविख्यात शिष्य हुए - स्वामी विवेकानंद। स्वामी जी की श्रीरामकृष्ण के प्रति अगाध निष्ठा थी। विश्वविजयी स्वामी जी ने न्यूयार्क में एक वक्तव्य के दौरान गुरुदेव का स्मरण करते हुए कहा था "वे ही मेरे आचार्य थे, मेरे इष्ट, मेरे प्रणम्य देवता थे। यदि मैंने शरीर-मन-वचन से कोई सत्कार्य किया है, अगर मेरे मुख से ऐसी कोई बात निकली है जिससे जगत का कोई व्यक्ति उपकृत हुआ है तो उसका गौरव मेरा नहीं है, मेरे गुरुदेव श्रीरामकृष्ण का है। मुझमें जो कुछ दुर्बल एवं दोषयुक्त है- वह सब मेरा है और जो कुछ जीवनप्रद है, पवित्र है, सभी उन्हीं की प्रेरणा से है, उन्हीं की वाणी है, वे स्वयं हैं।" 

श्रीरामकृष्ण देव सूत्र हैं, जिसके व्याख्याता  स्वामी विवेकानंद हुए। गुरुदेव से प्राप्त भाव उनके भीतर करुणा, साहस और विश्वास बनकर प्रकट हुआ। श्रीरामकृष्ण देव ने कहा था " अद्वैत ज्ञान को आंचल से बांधकर संसार का कार्य करना।"  स्वामी जी ने देखा कि ईश्वर केवल देवालयों में नहीं, बल्कि दरिद्र, रोगी, अशिक्षित और पीड़ित मानव के रूप में भी विराजमान हैं। इसी जीवंत ईश्वर की सेवा हेतु वर्ष 1897 में  रामकृष्ण मिशन की स्थापना हुई। 

सेवा में विस्तारित ईश्वरीय प्रेम एवं साधना

आज  "आत्मनो मोक्षार्थं जगद्धिताय च" के आदर्श से
अनुप्राणित रामकृष्ण मिशन आध्यात्मिकता और सेवा का अद्वितीय संगम है। मिशन के असंख्य सेवा प्रकल्प यथा - विद्यालय, चिकित्सालय, आपदा-राहत, ग्रामीण विकास और आध्यात्मिक शिक्षण इत्यादि संचालित होते हैं। इन सबके मूल में श्रीरामकृष्ण देव है। यहां प्रत्येक संन्यासी और सेवक यह मानकर कार्य करता है कि वह किसी व्यक्ति की नहीं, स्वयं ठाकुर एवं मां की सेवा कर रहा है। यही कारण है कि यह परंपरा केवल संस्था नहीं, बल्कि एक जीवित आध्यात्मिक आंदोलन बन चुकी है। 

आकांक्षा, भय - अनिश्चितता से जूझते विश्व के समक्ष श्री रामकृष्ण देव त्याग, श्रद्धा एवं सरलता का उज्ज्वल प्रकाश लिए खड़े हैं। विश्व चकित होकर भारतीय विभूतियों की ओर देखता है। इस पुण्य भूमि के निरक्षर संतों ने जीवन का सर्वोच्च ज्ञान सहज रूप में प्रगट किया। श्रीरामकृष्ण परमहंस का जीवन इसका जीवंत निदर्शन है। 
                                                                                                                                                                                                                                                                                      -नम्रता वर्मा