आदिशक्ति मां दंतेश्वरी मंदिर में 600 साल से निभाई जा रही है त्रिशूल परंपरा

दंतेवाडा में फागुन मंडई का आदिशक्ति मां दंतेश्वरी मंदिर में 600 साल से निभाई जा रही है त्रिशूल परंपरा दंतेवाड़ा देश की 51वीं शक्तिपीठों में शुमार आदिशक्ति मां दंतेश्वरी मंदिर दंतेवाड़ा में ऐतिहासिक और विश्व प्रसिद्ध फागुन मंडई का आगाज वसंत पंचमी पर त्रिशूल स्तंभ की स्थापना के साथ होता है। शुद्ध तांबे से निर्मित इस त्रिशूल को मंदिर के समक्ष स्थापित गरुड़ स्तंभ के पास विधि विधान से स्थापित किया जाता है । इसे राजा भैरमदेव ने राजस्थान के जयपुर से बनवाया था। यह परंपरा 600 साल से निभाई जा रही है। भाईचारा-मेल मिलाप का संगम है दंतेवाड़ा मेला दक्षिण बस्तर के दंतेवाड़ा जिले में प्राचीन समय से ही भारतीय संस्कृति में मेला-मंडई का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। इन मंडई मेलों में जहां सौहार्द, भाईचारा एवं मेल-मिलाप का संगम होता है। यह मेले लोगों के उमंग, उत्साह, खुशी, आस्था और मनोरंजन के महत्वपूर्ण साधन होते हैं। मंडई का अर्थ मड़ाना या स्थापित करना होता है। वस्तुत: मेला या मंडई आदिवासी जनजीवन के लोकोत्सव होते हैं। शंकनी-डंकनी नदी के संगम स्थल में बसे दंतेवाड़ा में 41 दिन तक चलने वाला फागुन मेला अपनी प्राचीन संस्कृति एवं अनूठी परंपराओं के कारण विश्व प्रसिद्ध है। इस ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक फागुन मेला फाल्गुन शुक्ल षष्टी से पूर्णिमा तक होता है। इस मेले में रोजाना विभिन्न रस्मों की अदायगी परंपरानुसार की जाती है। इनमें गंवरमार कोडरी मार आंवरामार चितलमार लम्हामार जैसी रस्म शामिल हैं। इन रस्मों में आदिवासी तरीके से पारंपरिक शिकार किया जाता है। मेले में शामिल होने के लिए आसपास के अंचलों की देवी-देवताओं को आमंत्रित किया जाता है। आमंत्रित देवी-देवताओं के साथ मां दंतेश्वरी होलिकोत्सव में शामिल होती हैं। रंग-भंग रस्म के दूसरे दिन आसपास और दूरस्थ अंचलों से पहुंचे देवी-देवताओं को ससम्मान विदाई दी जाती है। 41वें दिन फागुन मेले का समापन हो जाता है। विधिवत त्रिशूल स्थापना और आमा मउड़ रस्म के साथ ही विश्व प्रसिद्ध फागुन मंडई प्रारंभ हो जाती है। त्रिशूल को मां भगवती का अस्त्र माना गया है।इसलिए इसे प्रतीक के रूप में भी पूजा जाता है। राजा भैरमदेव ने बनवाया था जयपुर में पुजारी जिया के मुताबिक त्रिशूल करीब 600 साल पुराना है और इसे राजा भैरमदेव ने राजस्थान के जयपुर में बनवाया था। इसके अलावा चांदी से निर्मित थालियां आरती लोटा पानदान भी उन्होंने बनवाये थे। इनका उपयोग मंदिर में प्रतिदिन पूजा-अर्चना में होता है। मेला संपन्न होने के बाद आमंत्रित देवी-देवताओं की विदाई के दूसरे दिन त्रिशूल स्तंभ को मुख्य मंडप में रख दिया जाता है।

फ़रवरी 25, 2026 - 21:34
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